राजनीति

2027 की तैयारी: आरक्षित सीटों पर सपा का बड़ा गेम प्लान, भाजपा के गढ़ में सेंधमारी की रणनीति

‘PDA’ फॉर्मूले के दम पर 86 आरक्षित सीटों पर अखिलेश यादव की नजर, 2022 की 20 सीटों के आंकड़े को 50 के पार ले जाने का लक्ष्य

लखनऊ 07 जून :उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। सत्ता में वापसी के लिए छटपटा रही समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सबसे मजबूत किले यानी दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की एक बड़ी और सोची-समझी रणनीति तैयार की है। लोकसभा चुनाव 2024 में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की सफलता से उत्साहित सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अब राज्य की सभी आरक्षित सीटों पर विशेष फोकस बढ़ा दिया है। पार्टी का लक्ष्य भाजपा के इस पारंपरिक सामाजिक आधार को हिलाकर सत्ता का रास्ता साफ करना है।

तीन स्तर पर हो रहा जमीनी सर्वे

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सपा आरक्षित सीटों की जमीनी हकीकत समझने के लिए त्रिस्तरीय मूल्यांकन प्रक्रिया अपना रही है। इसमें:

संगठनात्मक रिपोर्ट: बूथ और ब्लॉक स्तर के पदाधिकारियों से इनपुट।

स्थानीय नेताओं का फीडबैक: क्षेत्र के कद्दावर नेताओं की प्रतिक्रिया।

स्वतंत्र फील्ड सर्वे: जमीनी स्तर पर मतदाताओं के मिजाज का आकलन।

विशेष रूप से उन सीटों पर पैनी नजर रखी जा रही है, जहां 2022 के चुनाव में हार-जीत का अंतर बेहद कम था।

चुनौती बड़ी: 20 से 50 पार पहुंचने का लक्ष्य

यूपी विधानसभा में सीटों का गणित

कुल सीटें: 403

एससी (SC) आरक्षित: 84

एसटी (ST) आरक्षित: 02

2022 में सपा की जीत: केवल 20 सीटें

उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में 86 सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित हैं। पिछले दो विधानसभा चुनावों में इन सीटों पर भाजपा का एकतरफा दबदबा रहा था। साल 2022 में सपा को इनमें से महज 20 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। लेकिन इस बार पार्टी ने इन सीटों पर अपनी ताकत बढ़ाकर कम से कम 50 सीटें जीतने का आक्रामक लक्ष्य रखा है।

युवा संगठनों को कमान, ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क पर जोर

इस अभियान को धार देने के लिए अखिलेश यादव ने अपने फ्रंटल संगठनों—छात्र सभा, युवजन सभा और यूथ ब्रिगेड को मैदान में उतार दिया है। ये संगठन गांवों और कस्बों का दौरा कर न केवल रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं, बल्कि नई पीढ़ी के दलित मतदाताओं से सीधा संवाद भी स्थापित कर रहे हैं।

पार्टी केवल बड़ी जनसभाओं पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि कार्यकर्ताओं को हर गांव और हर बूथ पर जाकर ‘घर-घर संपर्क’ करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके जरिए भाजपा सरकार की नीतियों की विफलता और सपा के सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण को जनता के सामने रखा जाएगा।

लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिला बूस्टर डोज

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के इस बदले रुख के पीछे लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम हैं। लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों पर सपा को बड़ी सफलता मिली थी, जिससे यह साफ हुआ कि दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से छिटककर सपा की तरफ आकर्षित हुआ है। इसी उत्साह को सपा 2027 तक बरकरार रखना चाहती है।

यदि अखिलेश यादव का यह ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ और सामाजिक समीकरण जमीन पर पूरी तरह कामयाब रहा, तो 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प होने वाला है और यह भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

Prabandh Sampadak chandrashekhar Singh

Prabhand Sampadak Of Upbhokta ki Aawaj.

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