विद्युत विभाग :घूस वापस गारंटी योजना!’ चौरीचौरा में ‘रिश्वत रिफंड स्कीम’?

खबर छपते ही क्लर्क ने लौटाए 15 हजार, अब जांच का ड्रामा?
क्या यही है चीफ इंजीनियर की कार्रवाई?
गोरखपुर 12सितंबर :मुख्यमंत्री के गृह जिले में जहां भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम का पूरा तंत्र रिश्वतखोरी और लीपापोती के एक नए मॉडल पर काम कर रहा है। चौरीचौरा विद्युत उपकेंद्र से सामने आया ‘रिश्वत वापसी’ का वाकया केवल एक सीनियर क्लर्क का व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि यह विभाग के शीर्ष अधिकारियों द्वारा जांच के नाम पर मामले को रफा-दफा करने के रवैये की पोल खोलता है।
कट-मनी’ और ‘रिफंड’ का अनूठा खेल
ब्रह्मपुर निवासी डॉ. सज्जन कुमार का खराब मीटर के नाम पर 60 हजार रुपये का बिल बनाया गया। आरोप है कि चौरीचौरा उपकेंद्र के सीनियर क्लर्क संतोष विश्वकर्मा ने बिल घटाकर 13 हजार करने के एवज में 20 हजार रुपये की ‘सुविधा शुल्क’ वसूली।
जब खबर उजागर हुई और विभाग में हड़कंप मचा, तो रिश्वत की रकम में से 15 हजार रुपये पीड़ित को ‘लौटा’ दिए गए।
सवाल 1: क्या रिश्वत के पैसे वापस कर देना अपराध का मार्जन है?
सवाल 2: बाकी के 5 हजार रुपये किसके हिस्से में गए?
सवाल 3: 60 हजार का बिल अचानक 13 हजार कैसे हो गया—क्या पहले बिल फर्जी बनाकर डराया गया था, या बाद में राजस्व को चूना लगाकर बिल घटाया गया?
कार्रवाई या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?
इतने गंभीर मामले के सार्वजनिक होने के बाद उम्मीद थी कि आरोपी कर्मचारियों पर निलंबन और एफआईआर जैसी सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन पूर्वांचल Discom के शीर्ष अधिकारी एफआईआर दर्ज कराने के बजाय केवल ‘विभागीय जांच’ का झुनझुना थमाकर समझौते की जमीन तैयार करते दिख रहे हैं।
जब मुख्य अभियंता स्तर का अधिकारी घूसकांड और राजस्व चोरी के इतने स्पष्ट मामले में कड़े एक्शन की जगह ‘जांच-जांच’ का खेल खेले, तो यह साफ है कि विभाग का मंशा आरोपी को बचाना और मामले को ठंडे बस्ते में डालना है।
CM सिटी में ‘सिस्टम’ का इकबाल खत्म?
डेढ़ महीने का प्रताड़ना काल:एक आम उपभोक्ता को अपना जायज काम कराने के लिए डेढ़ महीने तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े।
संगठित सिंडिकेट: मीटर खराब होने से लेकर बिल संशोधन तक की पूरी प्रक्रिया में क्लर्क से लेकर उच्च अधिकारियों का एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा है।
कार्रवाई से डर नहीं: मुख्यमंत्री के अपने शहर में विभागीय अधिकारियों का यह ‘समझौतावादी दृष्टिकोण’ यह साबित करता है कि निचले स्तर से लेकर मंडल स्तर तक भ्रष्ट कर्मचारियों को शीर्ष संरक्षण प्राप्त है।
यदि 60 हजार के बिल को 13 हजार करने के पूरे खेल की निष्पक्ष विजिलेंस जांच हो, तो चौरीचौरा उपकेंद्र से लेकर चीफ इंजीनियर कार्यालय तक कई बड़े चेहरे बेनकाब होंगे। अब देखना यह है कि शासन स्तर से इस ‘रिश्वत रिफंड मॉडल’ पर कोई ठोस हथौड़ा चलता है या विभागीय जांच की आड़ में इस फाइल को भी धूल चाटने के लिए छोड़ दिया जाएगा।
चाहे गोरखपुर में 13 पोल की अवैध बिजली लाइन बिछाने का मामला हो, कांवड़िए की मौत का दर्दनाक हादसा हो, मनचाही ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल हो या फिर बड़े उपकेंद्रों को एडिशनल चार्ज पर देकर चलाने का बड़ा फर्जीवाड़ा—ये तमाम प्रकरण गोरखपुर में फैले गहरे और संगठित भ्रष्टाचार की ओर साफ इशारा करते हैं। यह पूरा तंत्र साबित करता है कि स्थानीय आलाधिकारी कार्रवाई करने के बजाय केवल फाइलों को दबाने और समझौते कराने में माहिर हो चुके हैं।
प्रदेश सरकार की तथाकथित ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर यह एक करारा तमाचा है, जो यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कब तक सुशासन के दावों के बीच भ्रष्टाचारियों की इस ‘रिफंड और लीपापोती’ वाली दुकानदारी पर नकेल कसी जाएगी






