खुद गाड़ी लाओ तब देंगे ट्रांसफार्मर’: CM सिटी में बिजली अफसरों की बेलगाम दादागिरी? क्या ठंडे बस्ते में डालेंगे मामला?

गोरखपुर 29 जुलाई :सुशासन के बड़े-बड़े दावों और जीरो टॉलरेंस के नारों के बीच मुख्यमंत्री के गृह जनपद गोरखपुर से बिजली विभाग की संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली के परखच्चे उड़ा दिए हैं। जंगल कौड़िया क्षेत्र के महुआवां गांव में पिछले 5 दिनों से सन्नाटा और अंधेरा पसरा हुआ है। वजह— वर्कशॉप से लेकर क्षेत्रीय अधिकारियों का वो ‘अड़ियल और बेलगाम’ रवैया, जिसमें जनता को कीड़े-मकोड़े मान लिया गया है।
10 KVA पर 50 घरों का बोझ, विभाग को सिर्फ ‘धमाके’ का इंतजार!
महुआवां गांव के करीब 50 परिवार इस भीषण उमस और गर्मी में बिलबिला रहे हैं। तकनीकी रूप से बिजली का ककहरा जानने वाला कोई भी व्यक्ति बता देगा कि 10 KVA के छोटे से ट्रांसफार्मर पर 50 घरों का लोड लादना सीधे तौर पर उसे ‘कुर्बान’ करने जैसा है। बार-बार ओवरलोड होकर ट्रांसफार्मर फुंकना कोई दैवीय आपदा नहीं, बल्कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के तकनीकी कुप्रबंधन की जीती-जागती मिसाल है। लेकिन साहब लोगों को क्या?
एसी कमरों में बैठकर आंकड़े सुधारने वाले अफसरों को ग्रामीणों का पसीना दिखाई नहीं देता।
“गाड़ी लाओ, तब ट्रांसफार्मर मिलेगा!”— संवेदनहीनता की हद
ग्रामीणों (आशीष, गौतम, अश्विनी, अखिलेश, अशोक, हरिओम, संगम) का आरोप सीधे वर्कशॉप के जेई पर है। आरोप है कि जब बदहवास ग्रामीण नया ट्रांसफार्मर मांगने पहुंचे, तो जेई साहब ने फरमान सुना दिया— “खुद गाड़ी की व्यवस्था करो, तभी ट्रांसफार्मर मिलेगा!”
सरकारी महकमे में ट्रांसफार्मर परिवहन के लिए बजट, गाड़ियां और ईंधन सब कागजों पर दौड़ाया जाता है, तो फिर जनता से भाड़ा क्यों मांगा जा रहा है?
क्या वर्कशॉप का सरकारी वाहन केवल फाइलों में चल रहा है?
इतना ही नहीं, पिछले 48 घंटों से जेई और एसडीओ साहब ने सीयूजी फोन को ‘शो-पीस’ बना रखा है। ग्रामीणों की दर्जनों कॉल को अनसुना कर देना यह साफ बताता है कि जनता के प्रति इन साहबानों की जवाबदेही शून्य हो चुकी है।
XEN की ‘सफाई’: आश्वासन का झुनझुना या सच में होगी कार्रवाई?
मामला मीडिया में तूल पकड़ते ही एक्सईएन संजय कुमार बैकफुट पर आए। उन्होंने आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि सरकारी गाड़ी उपलब्ध है और ट्रांसफार्मर आज ही लगा दिया जाएगा। किसी ने गाड़ी मांगी है तो यह गलत है।”
एक्सईएन साहब का यह बयान महज आग बुझाने की कोशिश नजर आता है।
बड़ा सवाल: क्या यह मामला भी ‘ठंडे बस्ते’ की बलि चढ़ेगा?
कागजी दावों और जमीनी हकीकत का यह अंतर कोई नया नहीं है। असली सवाल अब वर्कशॉप के अधिशासी अभियंता और उनकी पूरी टीम की जवाबदेही का है:
सिस्टम का सच कौन सामने लाएगा?
अगर वर्कशॉप में सरकारी गाड़ी मौजूद थी, तो 5 दिन तक 50 परिवार अंधेरे में क्यों सड़े?
सीयूजी फोन रिसीव न करना कितना जायज?
जब सरकार अधिकारियों को 24 घंटे जनता की सेवा के लिए सीयूजी नंबर देती है, तो दो दिन तक ग्रामीणों के फोन काटना किस अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है?
क्या होगी कोई मिसाली कार्रवाई?
या फिर हर बार की तरह एक्सईएन साहब के ‘आज लग जाएगा’ के बयान के साथ मामले की लीपापोती कर दी जाएगी और वर्कशॉप के जिम्मेदार अधिकारियों की फाइल ठंडे बस्ते के सुपुर्द हो जाएगी?
सीएम सिटी के इस गांव की नजरें अब डिस्कॉम के उच्चाधिकारियों और प्रबन्ध निदेशक पर टिकी हैं— कि क्या ‘कामचोर और तानाशाह’ कार्यशैली अपना चुके वर्कशॉप के जिम्मेदारों पर गाज गिरेगी, या फिर जनता यूं ही भाड़ा ढोने और अंधेरे में रहने को मजबूर रहेगी!
भ्र्ष्टाचार और भ्र्ष्टाचारियो के विरुद्ध युद्ध अभी शेष है।






